बिहार के सीतामढ़ी जिले के दोस्तपुर गाँव के रहने वाले 65 वर्षीय भाग्यनारायण सिंह आज उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो प्रकृति से जुड़ना चाहते हैं। साल 2010 में उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया और महज़ कुछ पौधों से इसकी शुरुआत की। आज 15 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, उन्होंने अपनी 7 एकड़ भूमि को एक सघन और विविधतापूर्ण जंगल में तब्दील कर दिया है। उनके इस उपवन में केवल छायादार वृक्ष ही नहीं, बल्कि दुर्लभ औषधियाँ और विदेशी फल भी लहलहा रहे हैं, जो उनकी अटूट लगन का प्रमाण है।
विविधता का अनूठा संगम: आम से लेकर लाल चंदन तक
भाग्यनारायण जी की बागवानी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विविधता है। उनके बगीचे में 1300 से अधिक सागवान और महोगनी के ऊंचे वृक्ष हैं, तो वहीं 350 आम के पेड़ों में मालदह, बंबई, सोपिया शुकुल, महमूद बहार, अल्फांजो और आम्रपाली जैसी विश्व प्रसिद्ध किस्में शामिल हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने ठंडे प्रदेशों में होने वाले सेब (हर्मन वैरायटी), दालचीनी, तेजपत्ता, ऑल स्पाइसी, लाल और सफेद चंदन, अंजीर, आलू बुखारा और नाशपाती जैसे पौधों को भी गर्म मौसम में सफलतापूर्वक उगाकर सबको चौंका दिया है। इसके साथ ही सतावर, तुलसी और गुड़मार जैसी औषधियाँ उनके इस ‘ग्रीन हब’ की उपयोगिता और बढ़ा देती हैं।
श्रम और प्रबंधन का सटीक उदाहरण
कुल 25 एकड़ जमीन के मालिक भाग्यनारायण सिंह ने अपनी अधिकांश जमीन बताई (बटाई) पर दे रखी है, लेकिन 7 एकड़ को उन्होंने विशेष रूप से बागवानी के लिए आरक्षित रखा है। 65 वर्ष की उम्र में भी वे खुद बागवानी में सक्रिय रहते हैं और प्रतिदिन सुबह-शाम 2 से 3 घंटे पेड़ों की सेवा में बिताते हैं। व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए उनके पास 5 स्थाई दैनिक मजदूर हैं, जबकि भारी काम के समय वे 20 से 25 मजदूरों को रोजगार भी प्रदान करते हैं। उनकी कर्मठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 6 हजार से अधिक पौधों की वे स्वयं निगरानी करते हैं।
विवादों से परे समाज सेवा का भाव
भाग्यनारायण जी केवल प्रकृति प्रेमी ही नहीं, बल्कि एक उदार व्यक्तित्व के धनी भी हैं। हाल ही में उन्होंने सेब के 200 पौधे मंगाए थे, लेकिन कुछ स्थानीय विवादों के कारण उन्होंने हार मानने या पीछे हटने के बजाय, उन सभी पौधों को लोगों के बीच बांट दिया ताकि हर घर में हरियाली पहुँच सके। आज उनके इस विशाल उपवन में चीकू, शरीफा, कटहल, बेल और लीची जैसे फलों की भारी पैदावार होती है। उनका यह प्रयास न केवल बढ़ते तापमान के खिलाफ एक मजबूत ढाल है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध विरासत भी है।












